2019 के लिए मोदी ने आडवाणी-जोशी का कर दिया बलिदान !

2017-06-19 16:07:04

लखनऊ. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की प्रेस कांफ्रेंस से पहले तक राम नाथ कोविंद राष्ट्रपति पद के संभावित नामों की सूची में दूर-दूर तक शामिल नहीं थे। राष्ट्रपति पद के लिए जिस नेता का नाम सबसे ऊपर था वे थे लाल कृष्ण आडवाणी। भाजपा के लौह पुरुष, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनैतिक गुरु और भाजपा के हर संकट के मोचक रहे लाल कृष्ण आडवाणी से बड़ा नाम कम से कम भारतीय जनता पार्टी में चर्चा में नहीं था। कुछ समय पहले अचानक बाबरी विध्वंश मस्जिद मामले में सीबीआई कोर्ट में ट्रायल और आडवाणी-जोशी जैसे दिग्गज नेताओं की पेशी के बाद जानकार किसी अप्रत्याशित राजनैतिक घटनाक्रम का अनुमान लगा रहे थे। आज अमित शाह की प्रेस कांफ्रेंस के बाद यह साबित हो गया कि अब आडवाणी भाजपा के पितामह नहीं रहे बल्कि संरक्षक मंडल के एक सदस्य मात्र रह गए हैं।

दलित राजनीति का हो रहा था उभार 

जानकार मानते हैं कि लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जैसे नेताओं को दरकिनार कर राम नाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित करना दरअसल आगामी विधान सभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर की गई घोषणा है। इस बहाने विपक्ष के दलित राजनीति को अमित शाह और नरेंद्र मोदी चुनौती देने की कोशिश में जुटे हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में दलित राजनीति के नाम पर जिस तरह विपक्षी दलों ने अलग-अलग समूहों को जोड़कर सड़कों पर लाने में कामयाबी पायी थी, उसके बाद भाजपा की चिंता बढ़ रही थी। चिंता बढ़ रही थी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ।

शत्रुघ्न सिन्हा ने उछाला था आडवाणी का नाम 

पिछले दिनों बिहार के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने राष्ट्रपति पद के लिए लाल कृष्ण आडवाणी का नाम उछालकर एक तरह से आडवाणी धड़े की ओर से मोदी धड़े को खुली चुनौती दे दी थी। इन सबके बीच उत्तर प्रदेश से सांसद नरेंद्र मोदी ने गुजरात प्रेम से परहेज करते हुए और अपने गुरु की उपेक्षा करते हुए यूपी के कानपुर के राम नाथ कोविन्द को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। सवर्णवादी पार्टी के रूप में भाजपा पर ठप्पा लगाने की विपक्ष की कोशिश को नरेंद्र मोदी के इस फैसले से एक बड़ी चुनौती मिली है लेकिन भाजपा के भीष्म पितामह फिलहाल शर शैय्या पर विश्राम मुद्रा में है और शायद अपनी व्यथा किसी से कहने की अवस्था में नहीं है। दरअसल लाल कृष्ण आडवाणी 2019 में नरेंद्र मोदी और भाजपा को वोट दिला पाने में शायद राम नाथ कोविंद से अधिक कारगर साबित नहीं हो सकते थे। राम नाथ कोविंद का कद लाल कृष्ण आडवाणी की तुलना में चाहे जो हो, लेकिन आने वाले दिनों में कोविंद के नाम के सहारे राष्ट्रपति चुनाव की सियासी पिच पर भाजपा खुद को दलितों की हितैषी बताकर फ्रंट फुट पर खेलती नजर आएगी।

आज राष्ट्रपति पद पर  आडवाणी जी को नजर अंदाज करने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि बीजेपी से अटल आडवाणी युग का अंत हो गया। रामनाथ कोविंद अच्छे नेता हो सकते हैं।लेकिन लालकृष्ण आडवाणी के रहते बीजेपी की तरफ से किसी अन्य की दावेदारी पर विचार करना भी घोर अनैतिक और कृतघ्नता है.

यह ठीक है कि पिछले चार साल में देश और बीजेपी के अंदर आए राजनीतिक बदलाव की वजह से आडवाणी हाशिये पर चले गए, लेकिन आज बीजेपी जो कुछ भी है और जिस भी ऊंचाई पर है, वह सब वाजपेयी और आडवाणी की डाली हुई बुनियाद की वजह से ही है. वाजपेयी और आडवाणी ने न सिर्फ बीजेपी का पेड़ बोया, सालों साल इसे अपने ख़ून-पसीने से सींचा, बल्कि इसे इतना फल देने लायक भी बनाया, कि आज यह दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा कर रही है. इतना ही नहीं, इन दोनों नेताओं ने बीजेपी में कांग्रेस वाला यह कु-संस्कार नहीं पड़ने दिया कि किसी वंश विशेष का बच्चा ही राज करेगा. इन्होंने छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं को भी बड़ा होने का मौका दिया, जिसकी वजह से बचपन में चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी एक दिन इतने बड़े हो गए कि स्वयं आडवाणी को भी किनारे बैठ जाना पड़ा.

इसलिए, आडवाणी की भूमिका बीजेपी में महज एक वरिष्ठ नेता भर की नहीं है, एक ऐसे पिता और गुरु की भी है, जिसने अपने हाथों से न जाने कितने बच्चों को गढ़ा और बड़ा बनाया. कौन नहीं जानता कि स्वयं नरेंद्र मोदी भी आडवाणी के ही गढ़े हुए हैं. इसलिए पिता अगर कभी किसी बात को लेकर नाराज भी हो जाए, तो भी अच्छी संतानें उसके प्रति कृतज्ञता और आदर का भाव नहीं छोड़तीं. हिन्दू संस्कृति पितृदेवो भव और गुरुर्देवो भव जैसी अवधारणाओं पर ही टिकी है और हिन्दू राजनीति की अगुवा इस पार्टी के अधिकांश नेताओं के करियर में आडवाणी ऩे पिता और गुरू दोनों की भूमिका निभाई है.

आडवाणी एक बेदाग नेता हैं. तुलनात्मक रूप से ईमानदार माने जाते रहे हैं. जब हवाला मामले में उनपर आरोप लगे, तो उन्होंने संसद की सदस्यता से इस्तीफा देकर अपने बेदाग सिद्ध होने का इंतजार किया और राजनीति में शुचिता की एक अमिट मिसाल कायम की. आज आडवाणी पर सिर्फ एक आरोप है विवादास्पद बाबरी ढांचे के विध्वंस से जुड़ा, लेकिन सभी जानते हैं कि यह आरोप भी सिर्फ राजनीतिक है और देश की बड़ी आबादी इस आरोप के साथ नहीं है. इलाहाबाद हाई कोर्ट भी मान चुका है कि विवादास्पद भूमि राम जन्मभूमि की ही है

इसलिए जब कई लोग यह आशंका जताते हैं कि बाबरी विध्वंस के मामले में सीबीआई का इस्तेमाल कर केंद्र सरकार आडवाणी के राष्ट्रपति बनने का रास्ता रोक रही है, तो यह अजीब और अविश्वसनीय लगता है, क्योंकि इसी राम जन्मभूमि आंदोलन का राजनीतिक फायदा उठाकर बीजेपी 1989 की वीपी सिंह सरकार में गठबंधन सहयोगी बनी और फिर 1996, 1998 और 1999 में अपने नेतृत्व में 13 दिन, 13 महीने और 5 साल वाली सरकार बनाई. क्या बीजेपी का कभी इतना पतन हो सकता है कि उसी राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े राजनीतिक मामले को वह उसके नायक आडवाणी के खिलाफ इस्तेमाल करे?

 अगर आडवाणी गलत हैं, तो फिर बीजेपी की पूरी राजनीति ही गलत है और विपक्षी दलों के वे तमाम आरोप सही हैं, जो वे बीजेपी पर लगाते हैं. लेकिन अगर बीजेपी सही है और उसे जनता का समर्थन प्राप्त है, तो फिर इस पार्टी में सर्वाधिक सही आज भी लालकृष्ण आडवाणी ही हैं, जिनकी दशकों की मेहनत और दूरदर्शिता के बलबूते ही आज यह पार्टी इस ऊंचाई पर पहुंच गई है कि पूरा का पूरा विपक्ष इसके सामने बौना नजर आ रहा है.

इसलिए, यह ठीक है कि अगर 2014 की राजनीतिक परिस्थितियों में बीजेपी को प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी का नाम अधिक उपयुक्त लगा, तो उसने उन्हें पीएम बनाया, लेकिन राष्ट्रपति का चुनाव उसे आडवाणी के प्रति अपनी कृतज्ञता जताने का मौका दे रहा था लेकिन यह  मौका वह चूक गई, 

भारत के राजनीतिक इतिहास में इसे कृतघ्ना और पितृघात के बड़े उदाहरणों में गिना जाएगा । भारतीय संस्कृति की बात करने वाली पार्टी से कोई कार्यकर्ता कतई यह उम्मीद नहीं कर रहा था  कि वह अपने पितातुल्य व्यक्तित्व को कूड़ेदान में डाल देगी।आज ऐसे तमाम कार्यकर्ता आहत और आक्रोशित हैं।

आखरी विनती: प्यारे भाइयों और बहनों श्री लालकृष्ण आडवाणी जी का साफ-सुथरा व्यक्तित्व जिसकी तारीफ के लिए कुच्छ भी कहने के लिए शब्द भी कम पड़ जाए , वो शख्शियत जिसने भाजपा को फर्श से अर्श तक पहुँचाया बावजूद इसके जब 1977 भाजपा की लोक-सभा चुनावों में जीत हुई औऱ इन्हें प्रधान मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी जा रही थी तो इन्होंने खुशी-खुशी अपने परम मित्र श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को भारत का प्रधान मंत्री बनने में अपनी सहमति दी औऱ श्री नरेन्द्र मोदी जी को भी जीरो से हीरो बनाकर गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया और मोदी जी को प्रधानमंत्री पद की ओर अग्रसर करने में इनका प्रयास रहा हैं जो जग जाहिर हैं । ऐसे बड़े दिल वाले व्यक्तित्व को जब सम्मान स्वरूप कुच्छ अर्पण करने का समय आये और वो सभी लोग जो सब कुच्छ जानते हुए भी मुँह मोड़ ले इससे बड़ा हमारे भारतवर्ष के लिए दुर्भाग्यपूर्ण हो ही नही सकता । मेरी भारतवर्ष की जनता से अपील हैं कि उठों जागो ओर श्री आडवाणी जी को राष्ट्रपति पद की दावेदारी के लिए आवाज उठाओ औऱ इस मैसेज को इतना फैलाओ कि जाति-धर्म,भाई-भतीजावाद के अंधो की आँखें खुल जाए और उन्हें श्री आडवाणी जी के लिए राष्ट्रपति पद की याद आये और इस पद की गरिमा बनाएं रखने में भगवान इन सबको सद्बुद्धि दे ।

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